हम लोग सभी जानते हैं कि वर्ण व्यवस्था •
ब्राह्मण क्षत्रिय वैश्य और शूद्र •
(As per status and Mobilty theory,Journey
beginning to Highest in the Society)
में विभाजित थी, लेकिन शास्त्रों का अध्ययन करने पर स्पष्ट होता है कि जन्म के समय
सभी लोगों को शूद्र अर्थात एक ही समान पशुतुल्य माना गया था उदाहरण के लिए
Yaska Saint has clearly clarified that all are
shudras by birth,
(To be noted here ,It is not related to
casteism/But Varna ,as we say it is by
birth in ancient India)
– यास्क मुनि के अनुसार-
जन्मना जायते शूद्रः संस्कारात् भवेत द्विजः।
वेद पाठात् भवेत् विप्रःब्रह्म जानातीति ब्राह्मणः।।
अर्थात – व्यक्ति जन्मतः शूद्र है।
संस्कार से वह द्विज बन सकता है।
वेदों के पठनपाठन से विप्र हो सकता है।
किंतु जो ब्रह्म को जान ले,
वही ब्राह्मण कहलाने का सच्चा अधिकारी है।
Vidura was shudra but was respected for his
knowledge is called as Brahmin. Bhurishravah belonged to the backward caste of
pot makers, but was given the chair of president-ship in a sacrifice by the
Brahmin priests (Refer Bhagavatam).
महाभारत काल में विदुर , इड़ा, घोषा ,अपाला ,Romsa, Shradha,
Sarswati, Indrani etcशूद्र,व भूरिश्रवा कुम्हार प्राचीन भारत के ही उदाहरण है जो इस बात को पुष्टित करते हैं कि कर्म के आधार पर कोई भी व्यक्ति अपने वर्ण को बदल सकता था
रामायण की रचना बाल्मीकि जी ने की थी जो यह समझने के लिए पर्याप्त है की कोई भी व्यक्ति ब्राह्मण बन सकता है उनके द्वारा रचित रामायण आज हमारे समाज को एक
दिशा ही नहीं दे रही ,बल्कि दशा भी बदल रही है
दूसरी ओर हम देखते हैं कि शिव किरीट जनजाति के थे
उनको देवों के देव महादेव के रूप में पूजन करते हैं और हम अपनी मनोकामना आज भी मांगते हैं
ArchnaRaj
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